
आर्यसमाज वेदों का प्रचार करने की संस्था हे | वेदज्ञान ईश्वरीय ज्ञान हे | आर्य और समाज यह दोनों शब्द मिलकर आर्यसमाज शब्द बना हे | आर्य का मतलब श्रेष्ठ, संस्कारी, सुधारक, असत्य का विरोधी, अत्याचार व् अनाचार का विरोधी, निराकार इश्वर की उपासना एवम सत्य के पुजारी यह सब गुण जिनमे हो उसे आर्य कहते हे | और ऐसे लोगो का जहा मिलाप होता हे, एकत्रित होते हे, विचार विनिमय करते हे उसी स्थल को आर्यसमाज कहते हे | श्रेष्ठ लोगो का समाज का मतलब ही आर्यसमाज होता हे |
आर्यसमाज एक संस्था हे | आर्यसमाज कोई संप्रदाय नहीं हे | आर्यसमाज एक आस्तिक समाज हे | आर्यसमाज सच्चे इश्वर की सच्ची उपासना करता हे | मनुष्यों द्वारा बनाये गए भगवान या भगवान की मूर्तिया उया आकार को भगवान नहीं मानता | आर्यसमाज निराकार, सर्वशक्तिमान इश्वर को मानता हे | आर्यसमाज गुण कर्म स्वभाव अनुसार वर्ण व्यवस्था को मानता हे | आर्यसमाज राम और कृष्ण जेसे धर्मात्माओ को पूज्य मानता हे किन्तु इश्वर के स्वरुप में नहीं | क्योकि इश्वर कभी अवतार लेते ही नहीं |
स पर्यगाचछुक्रमकायम व्रणामस्नाविरं शुद्धम पापविद्धम |
कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभूर्याथातयतोsर्थन व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य: ||
अर्थात इश्वर कभी शरीर धारण नहीं करता, वह नस नाड़ी के बंधन एवम क्लेश से दूर रहेता हे, वह बंधन मुक्त हे |
जातस्य ध्रुवो मृत्यु ... गीता २/27
गीता में भी कहा हे कि जो जन्म लेता हे उसकी मृत्यु निश्चित हे | जिसका मृत्यु होगा उसका जन्म भी अवश्य होगा | इस लिए राम और कृष्ण महापुरुष थे इश्वर नहीं |
आर्यसमाज की स्थापना महर्षि दयानंद सरस्वती ने अपने जीवनकाल में सन १८७५ की ७ अप्रैल अर्थात चैत्र सूद १ सवंत १९३१ के दिन मुंबई में काकड़वाडी में आर्यसमाज के दस नियम के साथ हुई थी |
'संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश हे |' इस लिए महर्षि दयानंद ने समाज में फ़ले हुए अंधश्रद्धा, अन्धविश्वास, अनैतिकता, और पाखंड को नाश करने के लिए वेदानुसार एक संगठन बनाया जिसका नाम आर्यसमाज रखा |
लेकिन आर्यसमाज काकड़वाडी मुंबई की स्थापना होने से पहले आर्यसमाज की स्थापना राजकोट, गुजरात में हुई थी | लेकिन कुछ कारण यह आर्यसमाज का विघटन हो गया | उस समय के बाद फिरसे कई बार आर्यसमाज की स्थापना राजकोट में हुई और आर्यसमाज की प्रवृतियां शुरू हुई | परन्तु हर बार कुछ न कुछ कारण से आर्यसमाज का विघटन होता चला |
आर्यसमाज महर्षि दयानंद मार्ग, हाथीखाना की स्थापना १९५५ में आर्य पारिवारिक सत्संग समाज के रूप में हुई और आज तक समाज सेवा में कार्यरत हे |
आर्यसमाज महर्षि दयानंद मार्ग, हाथीखाना, राजकोट द्वारा बहुत से कार्यक्रम किये जाते हे | जेसे की श्रावणी महीने में वेदप्रचारार्थे वेद सप्ताह का आयोजन किया जाता हे | आर्यसमाज के भवन में पुरोहित द्वारा दैनिक प्रातः और सायं यज्ञ किया जाता हे | आर्यसमाज द्वारा वैदिक विधि से सोलह संस्कार कराये जाते हे | और बहुत सी प्रवृतियां आर्यसमाज द्वारा की जाती हे |
आर्यसमाज के सभी सदस्य सेवाभावी, और धार्मिक हे | सभी सदस्य हमेशा समाज की सेवा के लिए तैयार रहते हे | और आर्यसमाज में विद्वान पंडित द्वारा संस्कार विधि एवम विवाह संस्कार कराये जाते हे | आर्य समाज का मुख्य उद्देश समाज का कल्याण करना हे और वह सिर्फ और सिर्फ वेद प्रचार से ही हो सकता हे | आर्यसमाज, महर्षि दयानंद मार्ग, हाथीखाना, राजकोट में सभी वैदिक साहित्य उपलब्ध हे | आर्यसमाज राजकोट द्वारा सत्यार्थ प्रकाश के प्रचार के लिए भी प्रयत्न किये जाते हे | महर्षि दयानंद सरस्वती कृत सत्यार्थप्रकाश कोई भी व्यक्ति खरीद शके इस लिए उसका मूल्य भी महत कम रखा गया हे | वह सिर्फ सत्यार्थप्रकाश के प्रचार के लिए एक छोटा सा प्रयत्न किया गया हे |